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राज्य में अनुच्छेद 356 का प्रयोग कर राष्ट्रपति शासन लगाने व लेखानुदान अध्यादेश के केंद्र के फैसले के खिलाफ निवर्तमान मुख्यमंत्री हरीश रावत की अलग-अलग याचिका पर हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति केएम जोसेफ और न्यायमूर्ति वीके बिष्ट की संयुक्त खंडपीठ में सुनवाई जारी है। इस दौरान केंद्र के अधिवक्ता की दलील पर हाई कोर्ट ने पूछा कि उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने की क्या मजबूरी थी, जबकि सरकार को पांचवा साल था। उधर, बागी विधायकों की सदस्यता निरस्त करने के मामले में विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल की ओर से हाईकोर्ट में एकलपीठ के समक्ष पांच पेज का जवाब दाखिल कर दिया गया।

केंद्र सरकार की ओर से अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कर्नाटक के बोमाई मामले की दलील दी। उन्होंने कहा कि केंद्र ने अनुच्छेद 356 का प्रयोग सरकारिया आयोग की सिफारिशों के अनुरूप किया। संवैधानिक पहलुओं पर गौर करने के बाद ही राष्ट्रपति शासन लगाया गया। राज्यपाल की रिपोर्ट के हर बिंदु का अध्ययन करने के बाद ही राष्ट्रपति ने इसकी मंजूरी दी।

उन्होंने कहा कि राज्यपाल ने दो या तीन दिन में बहुमत साबित करने या हर हाल में 28 मार्च के पहले का समय दिया, लेकिन स्पीकर ने बिना सदन स्थगित किए शक्ति परीक्षण के लिए 28 मार्च की तिथि नियत कर दी।

केंद्र के अधिवक्ता ने कहा कि 68 सदस्यों के सदन में 35 विधायकों ने विनियोग विधेयक पर मत विभाजन की मांग की। राज्यपाल को भी प्रत्यावेदन दिया। इसके बाद भी स्पीकर ने ध्वनि मत से विधेयक पारित घोषित कर दिया।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि भाजपा के विधायक 18 मार्च की सुबह साढ़े दस बजे राजभवन पहुंचे। उन्होंने राज्यपाल से मत विभाजन कराने की मांग की। कांग्रेस की यह दलील असंवैधानिक है कि विनियोग विधेयक पर बहस नहीं हो सकती। मत विभाजन की मांग नहीं मान कर स्पीकर ने संविधान की दसवीं अनुसूची का उल्लंघन किया। उन्होंने दलील दी कि याचिका में तमाम तथ्यों को छिपाया गया और कोर्ट को गुमराह किया गया।

उन्होंने तर्क दिया कि स्पीकर ने विनियोग विधेयक पारित होने की प्रक्रिया नहीं अपनाई और बहुमत का अपमान किया। उन्होंने इस संबंध में नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट की ओर से राज्यपाल को दिए गए पत्र का हवाला दिया। इसमें उन्होंने लिखित में देकर मत विभाजन की मांग की थी।

उन्होंने कहा कि भाजपा विधायक गणेश जोशी को गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि सदन से गायब रहने वाले भाजपा विधायक भीमलाल आर्य को सरकार ने अंबेडकर समिति का उपाध्यक्ष बना दिया। ये सब एक साजिश के तहत किया गया।

सदन में स्पीकर ने विधायकों की मत विभाजन की मांग को नहीं माना। स्पीकर ने संवैधनिक बाध्यता के बाद मांग इसलिए ठुकराई कि सरकार अल्मपत में आ जाएगी। उन्होंने पंजाब, असम विधानसभाओं के मामलों का हवाला दिया। साथ ही कहा कि यहां बहुमत ने मत विभाजन मांगा, लेकिन स्पीकर ने यह कहते हुए ठकरा दिया कि मांग मानने या ना मानने का उन्हें अधिकार है।

उन्होंने कहा कि 28 मार्च की सुबह साढ़े दस बजे राजभवन पहुंचा विनियोग विधेयक। इससे पहले 27 मार्च को स्पीकर ने नौ बागी विधायकों की सदस्यता समाप्त कर दी, वो भी राष्ट्रपति शासन की अधिसूचना जारी होने के बाद। उन्होंने कहा कि बागी विधायकों और भाजपा विधायक भीम लाल आर्य के मामले में स्पीकर का दोहरा रवैया है। अब तक आर्य पर कार्रवाई नहीं की गई। वहीं नौ विधायकों का सदस्यता से ही निष्कासन कर दिया गया।

केंद्र के अधिवक्ता की दलील पर कोर्ट ने पूछा कि आपात स्थिति में ही केंद्र 356 का उपयोग करता है। इस मामले में जल्दबाजी क्यों की गई, जबकि सरकार को पांचवा साल लग गया था। साथ ही कोर्ट ने पूछा कि राज्यपाल ने जब 28 मार्च तक का समय बहुमत साबित करने को दिया था, तो राष्ट्रपति शासन लगाने की मजबूरी क्या थी।

जवाब में अटीर्नी जनरल रोहतगी ने कहा कि सरकार 18 मार्च को ही अल्पमत में आ गई थी। 35 विधायक मत विभाजन की मांग कर रहे थे, लेकिन स्पीकर ध्वनिमत से विधेयक पारित बता रहे। लोकतंत्र बहुमत से चलता है।

कोर्ट ने पूछा कि स्पीकर से मिलने के बजाय राज्यपाल से क्यों मिले विधायक। इस पर केंद्र के अधिवक्ता ने जवाब दिया कि स्पीकर से न्याय की उम्मीद नहीं थी, इसलिए विधायक राज्यपाल से मिले। उन्होंने राज्यपाल की ओर से केंद्र को भेजे गए उन पत्रों का हवाला दिया, जिसमें हॉर्स ट्रेडिंग की जिक्र किया गया है। साथ ही उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के स्टिंग मामले की कोर्ट के समक्ष रखा।

केंद्र के अधिवक्ता ने कहा कि स्पीकर ने बिना सुनवाई का मौका दिए बगैर मुख्यमंत्री बदलने की मांग कर रहे नौ विधायकों की दल बदल कानून के तहत सदस्यता निरस्त कर दी। मुख्यमंत्री को खुलेआम सौदेबाजी करते पूरे देश ने देखा। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति शासन लगाने की मुख्य वजह जानने का कोर्ट को हक है, लेकिन इस तथ्य को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता।

बागी विधायकों को लेकर विधानसभा अध्यक्ष ने दाखिल किया जवाब
बागी विधायकों की सदस्यता निरस्त करने के मामले में विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल की ओर से हाईकोर्ट में एकलपीठ के समक्ष पांच पेज का जवाब दाखिल कर दिया गया।
बागी विधायक कुंवर प्रणव चैंपियन और सुबोध उनियाल ने याचिका दाखिल कर विधानसभा अध्यक्ष की ओर से उनकी सदस्यता समाप्त करने को चुनौती दी थी। इस मामले में न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी की एकल पीठ ने विधानसभा अध्यक्ष से जवाब मांगा था। 22 अप्रैल तक बागी विधायकों को भी अपना जवाब दाखिल करना है। इस मामले में 23 अप्रैल को अगली सुनवाई Read more http://www.jagran.com/

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