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प्रदेश के निवर्तमान मुख्यमंत्री हरीश रावत की राष्ट्रपति शासन लागू करने व लेखानुदान अध्यादेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ और न्यायमूर्ति वीके बिष्ट की खंडपीठ में सुनवाई जारी है। आज फिर हाईकोर्ट ने पूछा कि राष्ट्रपति शासन लगाने का पर्याप्त आधार क्या है। साथ ही बहस के दौरान भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार को गिराने पर कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की कि कोई भी सरकार भ्रष्टाचार के बिना पांच साल नहीं चल सकती। यदि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार गिराई तो देश में कोई सरकार नहीं बचेगी।

केंद्र सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि ब्रिटेन में संसद सर्वोच्च है, लेकिन भारत में न्यायपालिका सर्वोच्च है। स्पीकर ने गलत किया है तो कोर्ट इस पर रोक लगा सकती है। उन्होंने स्पीकर के अधिकार संबंधी सुप्रीम कोर्ट के फैसले की टिप्पणी का भी जिक्र किया।

उन्होंने कहा कि केंद्र ने स्पीकर के आदेश को चुनौती नहीं दी है। 18 मार्च को स्पीकर ने अल्पमत की सरकार को ध्वनिमत से विनियोग विधेयक को पारित मान लिया। विधेयक पारित हुआ, इसका कोई सबूत नहीं। 68 के सदन में 35 विधायकों ने मत विभाजन की मांग की, लेेकिन स्पीकर अपना ही राग अलापते रहे।

केंद्र के अधिवक्ता की इस दलील का हरीश रावत के अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि सदन में विपक्ष के 27 विधायक नहीं थे। इस पर रोहतगी ने जवाब दिया कि 18 मार्च की सुबह राज्यपाल को सौंपे गए पत्र में 27 विधायकों ने हस्ताक्षर किए। स्पीकर की वजह से संवैधानिक संकट पैदा हुआ। इसलिए अनुच्छेद 356 लागू करना पड़ा। उन्होंने कहा कि बहुमत विधेयक सदन में गिरने के बाद राज्यपाल की ओर से दिए गए समय और नतीजे का इंतजार करने के लिए राष्ट्रपति बाध्य नहीं हैं।

उन्होंने कहा कि स्पीकर ने सरकार बचाने के लिए असंवैधानिक काम किया है। बीजेपी विधायक भीमलाल आर्य के मामले में कोई कार्रवाई नहीं की गई। सरकार अल्पमत में थी, इसलिए नौ बागी विधायकों की सदस्यता रद कर दी। मत विभाजन के भय के चलते भाजपा विधायक गणेश जोशी को गिरफ्तार करा दिया। ऐसे में केंद्र के पास अनुच्छेद 356 लगाने के पर्याप्त आधार थे। विनियोग विधेयक गिर गया था और सरकार अल्पमत में आ गई थी।

कोर्ट ने पूछा कि क्या 356 के लिए स्पीकर की कार्रवाई एकमात्र आधार थी, या फिर मनी बिल का गिरना आधार है। इस पर रोहतगी ने जवाब दिया कि मनी बिल गिरना पर्याप्त आधार है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि राज्यपाल दयालु प्रवृति के हैं, इसलिए उन्होंने समय दे दिया। इसकी जरूरत नहीं थी।

इस पर कोर्ट ने सवाल किया कि आप कह रहे हैं कि 35 विधायक मत विभाजन मांग रहे थे। वहीं स्पीकर कह रहे हैं विधेयक पारित हो गया। यह कैसे माना जा सकता है कि नौ विधायक आपको समर्थन करेंगे। इस पर केंद्र के अधिवक्ता ने जवाब दिया कि नौ विधायकों का ग्रुप बन गया था। इसलिए उन्हें विपक्षी बागी कह रहे हैं। उनका विनियोग विधेयक पर सरकार के खिलाफ वोट डालना तय था।

केंद्र की ओर से प्रसिद्ध संविधान विशेषज्ञ हरीश साल्वे ने दलील दी तो हरीश रावत के अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने उनकी बहस का विरोध किया। कोर्ट की अनुमति पर साल्वे ने संविधान के उन अनुच्छेद व संसद की कार्यवाही का उदाहरण दिया, जो उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए अहम है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ने कैबिनेट की सिफारिश मानी, जबकि वह लौटा सकते थे। इसका मतलब राज्य के लिए 356 सही और संवैधानिक फैसला था।

उन्होंने दलील दी कि विधायकों की खरीद फरोख्त की संभावना थी। भ्रष्टाचार तय था, इसलिए 356 लगाई गई। इस पर कोर्ट ने देश की हर सरकार में भ्रष्टाचार होना स्वीकारते हुए टिप्पणी की कि भ्रष्टाचार के बिना देश में कोई सरकार पांच साल नहीं चल सकती। कोर्ट ने कहा कि यदि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार गिराई तो कोई सरकार नहीं बचेगी।

केंद्र के अधिवक्ता हरीश साल्वे ने कहा कि 356 लोकतंत्र को बचाने का हथियार है। उत्तराखंड में इसे दंड के रूप में लिया जा रहा है, जो संविधान सम्मत नहीं है। राष्ट्रपति ने पर्याप्त आधार के बाद ही इसकी मंजूरी दी। अब इसको चुनौती कैसे दी जा सकती है। उन्होंने भाजपा विधायकों के राष्ट्रपति को दिए पत्र का हवाला दिया, जिसमें खरीद-फरोख्त का अंदेशा जताया गया था।

बीते रोज उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लागू करने के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए नैनीताल हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि बहुमत साबित करने का मौका देने के बावजूद कौन सी मजबूरी थी, जिसकी वजह से राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा। हाईकोर्ट ने यह भी सवाल किया कि विनियोग विधेयक पर मत विभाजन की मांग करने के लिए विधायक स्पीकर को प्रत्यावेदन की बजाय राज्यपाल से मिलने क्यों गए। यही नहीं, यह भी पूछा कि सरकार के पांचवें साल में यह परिस्थिति कैसे पैदा हो गई। Read more http://www.jagran.com/

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