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भारत की आजादी के बाद भी कांग्रेस पार्टी को भारतीय जनमानस ने आंदोलन के तौर पर देखा। नतीजा भी सबके सामने था। कांग्रेस की सरकार इस देश पर लंबे समय तक काबिज रही। लेकिन समय के साथ कांग्रेस से लोगों की नाराजगी बढ़ी और सत्ता विपक्ष के हाथों में चली गई। हालांकि, कांग्रेस ने समय-समय पर वापसी भी की। 2004 से 2014 के दौरान यूपीए के तौर पर सत्ता पर काबिज कांग्रेस का सूपड़ा 2014 के आम चुनावों में साफ हो गया। 130 साल पुरानी पार्टी दहाई के अंक में सिमट गई। नतीजा ये हुआ कि केंद्र की सत्ता पर उसकी धुर विरोधी भाजपा काबिज हो गई। पिछले दो सालों में कांग्रेस ने मोदी विरोध की ही राजनीति की है। अगर कांग्रेस अपनी मौजूदा रणनीति पर काम करती रही हो तो 2019 में कांग्रेस का लोकसभा में आंकड़ा 44 से घटकर शून्य हो सकता है। आइए दस मुख्य कारणों पर डालते हैं नजरः-

अंग्रेजी अखबार डेली के मुताबिक कांग्रेस नेताओं पर भ्रष्टाचार के मामले किसी से छिपे नहीं है। यूपीए -2 का शासनकाल भ्रष्ट कारनामों की वजह से भारतीय जनमानस के दिलोदिमाग में दर्ज है। कांग्रेस के कई कद्दावर नेता भ्रष्टाचार के मामलों का सामना कर रहे हैं। जिसमें राष्ट्रीय नेताओं समेत राज्य स्तरीय नेता भी शामिल हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, उपाध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ डेक्कन हेरॉल्ड का मामला गर्माया हुआ है। वहीं ताजा अगस्ता वेस्टलैंड मामले में सोनिया, राहुल और पूर्व पीएम मनमोहन के नाम आने से कांग्रेस बुरी तरह से बैकफुट पर है। पी चिदंबरम, अशोक चव्हाण, ओमान चांडी, मल्लिकार्जुन खड़गे, वीरप्पा मोइली, भूपेंद्र सिंह हुड्डा ये वो नाम हैं जिनके खिलाफ या तो 2018 तक न्यायिक प्रक्रिया पूरी हो जाएगी या इनमें से कुछ को सजा भी मिल जाएगी। ऐसे हालात में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस जनता के बीच हमलावर नहीं सकेगी।

पिछले दो वर्ष से कांग्रेस संसद में हंगामा करने की रणनीति पर काम करती रही है। कांग्रेस ने जनता को ये संदेश देने की कोशिश की है कि वो लोकतंत्र के मंदिर में सरकार की जनविरोधी नीतियों का मुखालफत कर रही है। इन दो वर्षों में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार पूरी तरह कमजोर और लाचार महसूस करती रही है। लेकिन कांग्रेस गतिरोध उत्पन्न करने के हथियार को 2019 तक इस्तेमाल नहीं कर सकती है। आमतौर पर निष्पक्ष रहने वाले उद्योेगपतियों ने जीएसटी के मुद्दे पर राष्ट्रपति को चिठ्ठी लिखकर दखल देने की अपील की है। अगर कांग्रेस अपने इस तरह के बर्ताव को जारी रखती है तो उस हालात में ज्यादा से ज्यादा अध्यादेश पारित होंगे या संसद के संयुक्त अधिवेशन में विधेयकों को पारित कराया जाएगा। इस हालात में जनता के बीच कांग्रेस के खिलाफ गलत संदेश जाएंगे।

कांग्रेस के खजाने में तेजी से कमी आ रही है। पार्टी को मिलने वाले डोनेशन में कमी आई है। कांग्रेस का रिजर्व फंड सूखता जा रहा है। ट्विटर पर इस तरह की भी खबरें हैं कि कांग्रेस को ओवरड्रॉफ्ट की मदद लेनी पड़ रही है। यही नहीं पार्टी नेताओं को फंड इकठ्ठा करने के निर्देश दिए गए हैं। बताया जा रहा है कि विपक्ष में आने के बाद कांग्रेस को पहली बार ऐसी हालात का सामना करना पड़ रहा है।

1977, 1989, 1996 और 1998 में सत्ता गंवाने के बाद भी कांग्रेस के पास विधायकों की संख्या में कमी नहीं आयी। राज्यों में कांग्रेस अपनी सरकारों की मौजूदगी के बाद केंद्र पर सत्ता हासिल करने में कामयाब रही। लेकिन मौजूदा समय में कांग्रेस के पास विधायकों की संख्या में कमी आयी है। देश के बड़े सूबों से कांग्रेस का सुपड़ा साफ हो चुका है। बताया जा रहा है कि कांग्रेस को केरल में मूंह की खानी पड़ सकती है। 2018 में कर्नाटक में कांग्रेस को शिकस्त मिल सकती है। वहीं भाजपा बड़े राज्यों में काबिज है। जम्मू-कश्मीर और आंध्रप्रदेश में साझा सरकार चलाकर ये संदेश दे रही है कि वो अलग अलग विचारों को भी साथ लेकर चल सकते हैं।

इस साल के अंत तक राज्यसभा में भाजपा एक बड़ी पार्टी के तौर पर उभरेगी। वहीं 2018 में कांग्रेस और भाजपा के बीच का अंतर और बढ़ेगा। राज्यसभा में कमजोर होने की वजह से भाजपा मुखर नहीं हो पा रही है। लेकिन आने वाले समय में भाजपा कांग्रेस पर और हमलावर होगी।

2012 तक राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनावों में कांग्रेस ड्राइविंग सीट पर रहा करती थी। वजह बहुत साफ थी कि इलेक्टोरल कॉलेज में कांग्रेस को बहुमत हासिल था। इसी कारण से 2002 में तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी को ए पी जे अब्दुल कलाम पर हामी भरनी पड़ी। लेकिन 2017 में लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभाओं में भाजपा का बहुमत होगा। इस स्थिति में कांग्रेस राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में किसी तरह की दबाव नहीं बना पाएगी।

सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी, ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल और रेल मंत्री सुरेश प्रभु लगातार उन योजनाओं पर काम कर रहे हैं जिसका असर जमीन पर दिखाई दे। बताया जा रहा है कि बहुत सी केंद्रीय योजनाओं का असर 2018 तक जमीन पर दिखने लगेगा। उस हालात में कांग्रेस और हमलावर नहीं हो पाएगी। भारत में बिजली-सड़क और पानी इन तीन मुद्दों पर चुनाव लड़े जाते रहे हैं। लेकिन भाजपा बिजली-सड़क-रेल को मुद्दा बना सकती है।

कांग्रेस 2019 के आम चुनाव में किसे पीएम पद पर प्रोजेक्ट करेगी। इसे लेकर स्थित साफ नहीं है। जबकि भाजपा में पीएम पद के दावेदारी पर किसी तरह की भ्रम की स्थिति नहीं है। अगर राहुल के नाम पर चर्चा होती है तो उनके मौजूदा कामकाज से ये साफ होता है कि वो पीएम मोदी के मुकाबले कहीं ठहरते ही नहीं है। कांग्रेस किसी भी नेता को इस तरह से तैयार नहीं कर रही है कि जो पीएम मोदी का मुकाबला कर सके। इसके अलावा भारतीय राजनीति में बेहतर विकल्प के न होने का मुद्दा भी जमकर काम करता है।

लोकसभा और गुजरात विधानसभा चुनावों में पीएम मोदी के असाधारण प्रदर्शन से उनकी काबिलियत जगजाहिर है। इसके अलावा वो अपने कार्ड्स को ऐन वक्त पर खोलते हैं। उन्हें पता है कि कौन सा मुद्दा कब बेहतर ढंग से काम कर सकता है। हो सकता है कि 2019 के लिए उनके दिमाग में कोई योजना हो जिसका खुलासा हो आम चुनावों के समय ही करें।

1977 में आम चुनावों मे मिली हार के बाद कांग्रेस संगठित हुई और उचित मौके की तलाश की । कांग्रेस नेताओं की संगठित कार्यप्रणाली से इंदिरा गांधी की अगुवाई में पार्टी दोबारा सत्ता में आयी। वहीं 1989 में वी पी सिंह की सत्ता से जाने के बाद चंद्रशेखर सिंह को पीएम बनाकर एक रणनीति पर काम किए। और ये साबित किया कि गैर कांग्रेस पार्टियों को शासन करने का तरीका नहीं आता है। लेकिन इस बार कांग्रेस नेतृत्व पूरी तरह हताश और निराश है।  Read more http://www.jagran.com/

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