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इस बार भारत में मानसून आने में देरी के मुख्य कारक तापमान, हवा, दबाव और बर्फबारी को माना जा रहा है। भारत में कुल 29 राज्य एवं 7 केन्द्र शासित क्षेत्र हैं। इनमें मौसम विभाग के यंत्रों द्वारा तापमान का प्रत्येक भाग में अध्ययन किया गया। मार्च में उत्तर भारत के और पूर्वी समुद्री तट के मई में मध्य भारत के और जनवरी से अप्रैल तक उत्तरी गोलार्ध की सतह के अधिकतम एवं न्यूनतम तापमान नोट किए गए। बता दें कि इस बार तापमान सामान्य से ज्यादा मापा गया है।

तापमान के अलावा हवा का भी अध्ययन हुआ। वातावरण में छह किलोमीटर और 20 किलोमीटर ऊपर बहने वाली हवा के रूख को अलग-अलग महीनों में नोट किया गया। हवा का भी रुख सामान्य से कम ही मापा गया। इसके साथ ही मानसून की भविष्यवाणी में वायुमंडलीय दबाव की भी अहम भूमिका रही। वसंत ऋतु में दक्षिणी भाग का दबाव और समुद्री सतह का दबाव जबकि जनवरी से मई तक हिन्द महासागर में विषुवतीय दबाव को मापा गया।

बर्फबारी भी इसमें अहम योगदान निभाती है। लिहाजा जनवरी से मार्च तक हिमालय के खास भागों में बर्फ का स्तर, क्षेत्र और दिसम्बर में यूरेशियन भाग में बर्फबारी की भी अहम भूमिका रही। इस बार देश भर में फैले सूखे से पहाड़ी क्षेत्रों में बर्फबारी में काफी असर पड़ा। इसलिए बर्फबारी मानसून के देरी में एक मह्तवपूर्ण कारक बनी। सारे पैरामीटरों के अध्ययन उपग्रह से आँकड़े के अनुसार होते हैं। इन कारणों से इस बार मानसून के आने में विलंब हुआ। वैसे भारतीय मौसम विभाग ने चालू सीजन में दक्षिण-पश्चिम मानसून के सामान्य से अधिक रहने का पूर्वानुमान लगाया है।

मौसम विभाग के आकड़े

मौसम विभाग के मुताबिक मानसून आमतौर पर 1 जून से शुरू होकर सितंबर तक रहता है। लेकिन इस साल ये 7 जून तक आएगा। सरकार के अनुसार मानसून के एकबार आने के बाद 89 सेंटीमीटर (35 इंच) के 50 साल के औसत की कुल 106 प्रतिशत वर्षा दर्ज की जाएगी। स्काईमेट मौसम सर्विसेज के मुताबिक मानसून अगले कुछ दिन में दस्तक देगा और इसका औसतन आकड़ा 109 प्रतिशत हो सकता है, जो कि 1994 के बाद से सबसे अधिक बारिश का आकड़ा होगा। पिछले साल मानसून वर्षा मौसम 14 प्रतिशत थी, जो कि 2014 की 12 फीसदी से भी कम आंकी गई थी। 2015 में महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में सूखा घोषित किया गया था। Read more http://www.jagran.com

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