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आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन के मुद्दे पर सियासी खींचतान के बीच पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ने सनसनीखेज दावा किया। उन्होंने कहा कि राजन आरबीआई के गवर्नर बनना चाहते थे। राजन को गवर्नर बनाकर उन्होंने उनका सम्मान किया। मनमोहन सिंह से एक साक्षात्कार में जब ये पूछा गया कि क्या राजन को पिछले दरवाजे से गवर्नर बनाया गया। इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि गवर्नर की रेस में कई लोग थे। सरकार योग्य शख्स को इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपना चाहती थी। रघुराम राजन की योग्यता नि:संदेह इस पद के लायक थी। जब मौका आया तो उन्हें आरबीआई गवर्नर की जिम्मेदारी दी गयी।

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक मनमोहन सिंह ने पहले राजन को पीएम का अवैतनिक सलाहकार बनाया। इसके बाद जब मुख्य आर्थिक सलाहकार का पद खाली हुआ तो राजन को ये जिम्मेदारी सौंपी गई। मुख्य आर्थिक सलाहकार के पद पर रहते हुए राजन ने ये इच्छा जाहिर किया कि जब गवर्नर का पद खाली हो तो उनकी अर्जी पर विचार किया जाए। इस मामले में तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने भी सहमति जताई और राजन को आरबीआई का गवर्नर बनाया गया। ऐसा करके उन्होंने एक योग्य शख्स का सम्मान किया।

वित्त मंत्री-आरबीआई गवर्नर में होते रहे हैं मतभेद

मनमोहन सिंह ने कहा कि वित्त मंत्रियों और आरबीआई गवर्नर के बीच अनेक मुद्दों पर मतभेद होते रहे हैं। ये कोई नई बात नहीं है। लेकिन उनके कार्यकाल के दौरान रिश्ता बहुत सहज था। उनके समय रहे गवर्नर रंगराजन एक सीनियर टेक्नोक्रेट थे। जब की किसी मुद्दे को लेकर असहमति हुई तो दोनों लोगों ने मिलकर उस समस्या को सुलझाने की कोशिश की। लेकिन इस सरकार में आए दिन सरकार और आरबीआई के बीच टकराव की खबरें न्यूज हेडलाइंस बन जाती हैं।

राजन पर स्वामी साधते रहे हैं निशाना

रघुराम राजन के कार्यकाल की भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी आलोचना करते रहे हैं। उनके जरिए स्वामी ने वित्त मंत्री जेटली को निशाने पर ले लिया था। हालांकि पीएम मोदी ने एक साक्षात्कार में साफ कर दिया कि महज पब्लिसिटी के लिए बयानबाजी से बचना चाहिए। इसके अलावा पीएम ने ये भी कहा कि कोई भी शख्स व्यवस्था से ऊपर नहीं है। संस्थाओं का सम्मान करने की जिम्मेदारी हर एक शख्स की है।

पूर्व पीएम मनमोहन सिंह को है दुख

मनमोहन सिंह ने कहा कि 25 साल पहले 1991 में सत्ता में आने के बाद कांग्रेस के सामने आर्थिक समस्याएं खड़ी थीं। आर्थिक सुधारों के जरिए भारत को मुश्किलों से निकालने की कोशिश हुई। देश आर्थिक तौर पर सबल हुआ। लेकिन आज 25 साल बाद हालात फिर वही है, जो 1991 में थी। मनमोहन सिंह ने कहा कि तत्कालीन पीएम नरसिम्हाराव के सामने जब देश की आर्थिक बदहाली का जिक्र किया गया तो उन्होंने तत्काल कदम उठाने को कहा। उन्होंने जब आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया शुरू की तो पार्टी के अंदर ही जबरदस्त विरोध था। लेकिन नाथू राम मिर्धा, मणिशंकर अय्यर ने उनके प्रयासों की सराहना की।

1991 में सोना गिरवी रखना जरुरत थी

मनमोहन सिंह ने कहा कि कांग्रेस के सत्ता में आने से पहले सोने की एक खेप को गिरवी रखा जा चुका था। कांग्रेस ने सिर्फ प्रक्रियाओं का पालन करते हुए दूसरी खेप को बिना किसी शोर-शराबे के गिरवी रखा। ये बात सच है कि विपक्ष ने कांग्रेस के इस कदम की आलोचना की। लेकिन हकीकत ये थी कि अगर ऐसा कदम नहीं उठाया गया होता तो देश मुश्किलों में फंस जाता और उससे निकलने का रास्ता बेहद ही कठिन था।

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